21 वी सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य (भाग दो)

6    चार चरण वाला  युग धर्म

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चार चरण वाला
युग धर्म

 

      इक्कीसवीं सदी में सर्वसाधारण के जीवन में चार अनुबंधों का सघन समावेश होगा। (1) समझदारी (2) ईमानदारी (3) जिम्मेदारी (4) बहादुरी। इन चारों आदर्शों को चार वेदों का सार तत्त्व समझा जा सकता है। धर्म के यही चार चरण रहेंगे। अभिनव समाज और परिष्कृत वातावरण की संरचना इन्हीं आदर्शों को अपनाते हुए की जाएगी। नवयुग का नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र भी इन्हीं चार तथ्यों पर आधारित होगा। इन्हीं की अवहेलना से अनेक दुर्भावनाएँ और दुष्प्रवृत्तियाँ पनपी हैं। उनका निराकरण समाधान भी इन्हीं चारों के पुनः प्रतिष्ठापन से संभव होगा।

      समझदारी-तुरंत का लाभ देखकर उस पर बेहिसाब टूट पड़ना उसके साथ जुड़े हुए भविष्य के दुष्परिणामों को न समझ पाना ही नासमझी है। यह नासमझी ही अनेक समस्याओं, कठिनाइयों, विपत्तियों और विभीषिकाओं का मूलभूत कारण है। यदि अगले दिनों अपने कृत्यों के परिणामों को ध्यान में रखा जा सके, तो किसी को भी किसी प्रकार की कठिनाइयों का सामना न करना पड़े और ऐसा कुछ न बन पड़े, जिससे भविष्य के अंधकारमय बनने का अवसर आए।

      चिड़ियाँ ढेरों दाना सहज ही पा लेने के लोभ में फँसती हैं। मछलियाँ भी आटे के लालच से जाल में फँसती और प्राण गँवाती हैं। चाशनी के कढ़ाव में बिना आगा-पीछा सोचे टूट पड़ने वाली मक्खियों की भी, पंख फँस जाने पर ऐसी ही दुर्गति होती है।

      असंयमी, अनाचारी, दुर्व्यसनी तत्काल का लाभ देखते हैं और यह भूल जाते हैं कि इस उतावली के कारण अगले ही दिनों किन दुष्परिणामों का सामना करना पड़ेगा। जिनकी आँखों में दृष्टि दोष हो जाता है वे मात्र समीपवर्ती वस्तु ही देखते हैं। दूर की वस्तुएँ उन्हें दिखाई ही नहीं पड़तीं। इसलिए बार-बार ठोकरें खाते, टकराते और गढ्ढों में गिरते रहते हैं।

      इन दिनों व्यक्ति और समाज के सामने अगणित समस्याएँ हैं। इन सबका एक ही कारण है, नासमझी। असंयमी, प्रमादी सजधज को प्रधानता देने वाले अहंकारी, मात्र उद्धत कृत्यों में ही लाभ देखते हैं और यह भूल जाते हैं कि प्रामाणिकता गँवा बैठने असमर्थ रह जाने और कुटैवों के अभ्यस्त बन जाने पर किस प्रकार अपना व्यक्तित्व ही हेय बन जाता है। अनगढ़ स्थिति में पड़े रहकर ऐसी हानि उठाते हैं जिसकी क्षतिपूर्ति भी न हो सके।

      इन दिनों नासमझी ही महामारी बनकर हर किसी के सिर पर छाई हुई है। भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण इसी कारण बन पड़े हैं। मन:स्थिति परिस्थितियों को जन्म देती हैं और उसके अवांछनीय होने पर अपने लिए, संबंधित अन्यान्यों के लिए अनेक प्रकार के संकट उत्पन्न करती है। समझदारों की नासमझी ही अगणित विपत्तियों का कारण बनी हुई है। यह सच है कि मनुष्य भटका हुआ देवता है। वही अपने भाग्य का निर्माता भी है। प्रवाह प्रचलन को सही दिशा देने की उसमें परिपूर्ण सामर्थ्य है। दिशा-बोध ही समस्त भटकावों का निराकरण है। इन दिनों सभी विचारशीलों का दृष्टिकोण एवं पुरुषार्थ एक केन्द्र पर केन्द्रित होना चाहिए। आदर्शों के प्रति श्रद्धा तथा तर्क, तथ्य और प्रमाण के पक्षधर विवेक का समन्वय यदि बन पड़े, तो समझना चाहिए कि भँवर से नाव को पार कर लेने में और कोई बड़ा व्यवधान शेष नहीं रह गया।

      ईमानदारी-दूसरों से अपने लिए जिस प्रकार के व्यवहार की आशा करते हैं वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करना, यही ‘ईमानदारी’ की समग्र परिभाषा है। हम दूसरों से स्नेह की, सहयोग की, सद्भाव की, सद्व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। ठीक वैसा ही दूसरों के साथ अपना व्यवहार बनता रहे। ईमानदारी के समस्त उदाहरण इसी एक तथ्य को चरितार्थ करने में सन्निहित हो जाते हैं। अपने को बुरा लगता है उसी का आचरण दूसरे के साथ किया जाए तो इसे बेईमानी कहना होगा।

      हम नहीं चाहते कि कोई हमें ठगे, पीड़ा पहुँचाए, निष्ठुरता बरते, असभ्यता बरते, फिर ठीक वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ हम अपनी ओर से क्यों करें? यदि दूसरों के स्थान पर होते तो हम किस प्रकार के बर्ताव की आशा करते? ठीक इसी कसौटी पर, हर प्रसंग में, हर क्षेत्र में कसकर यह जानना चाहिए कि अपनी ईमानदारी खरी है या खोटी?

      ईमानदारी ही धर्म है। उसी को भक्ति, ज्ञान, अध्यात्म, साधना तपश्चर्या का सार तत्त्व समझना चाहिए। इसके लिए किसी बड़े ग्रंथ को पढ़ने या संत विद्वान् के पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं है। इस संबंध में सबसे अधिक सुयोग्य न्यायाधीश अपनी आत्मा ही हो सकती है। अपने से बार-बार पूछते रहना चाहिए। अपने को जाँचना चाहिए कि न्याय का सिद्धान्त कितनी मात्रा में अपनाया जा रहा है। जितना अपने को खरा पाया जाए समझना चाहिए कि उतने ही अंशों में हम धर्मात्मा हैं।

      दूसरे लोग बेईमानी बरतते हों, तो उस कुचक्र से अपने को बचाना चाहिए। अनीति पर उतारू लोगों को समझाने से लेकर प्रताड़ित करने तक की नीति अपनानी चाहिए, पर बदले में ऐसा न किया जाए कि स्वयं ही दूसरे गिरे हुए व्यक्ति के स्तर पर नीचे उतर आएँ।

      जिम्मेदारी-मनुष्य स्वतंत्र, स्वच्छंद, स्वेच्छाचारी घूमता है, पर वस्तुतः वह अनेक उत्तरदायित्वों से बँधा है। अनेक अनुशासन उस पर लागू होते हैं। शरीर को स्वच्छ रखने के लिए आहार-विहार की मर्यादाओं का परिपालन, मन को संतुलित और प्रमुदित बनाए रखने के लिए सद्भावनाओं का अवधारण, आर्थिक कठिनाई न बढ़ने देने के लिए नागरिक स्तर का निर्वाह, परिवार के सदस्यों को सुयोग्य, स्वावलंबी, सुसंस्कृत बनाने के लिए अनवरत प्रयास जैसे अनुबंधों का ठीक तरह से पालन करने पर ही कोई सुखी समुन्नत रह सकता है और संपर्क क्षेत्र को प्रसन्न बना सकने का श्रेय पा सकता है। जो इन जिम्मेदारियों की उपेक्षा करते हैं, वे अनाचरण में फँसते और अनेक प्रकार के त्रास सहते हैं।

      निजी जीवन से एक कदम आगे बढ़कर सामाजिक क्षेत्र में उच्चस्तरीय भूमिका निभाने का महत्वपूर्ण कदम बढ़ाना मानवी गरिमा की परिधि में आता है। ‘वसुधैव कुुटुम्बकम्’ की मान्यता आदर्शवादिता में गिनी जाती है। दु:खों को बँटा लेना और सुखों को बाँट देना, हिल-मिलकर रहना और सुख-सुविधाओं का मिल बाँट कर उपयोग करना ऐसी रीति-नीतियाँ हैं, जिन्हें अपनाने वाला स्वयं श्रेयाधिकारी बनता है और अनेक को अनुकरण के लिए प्रेरित करता है।

      स्रष्टा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र-युवराज के रूप में मनुष्य को सृजा और सृष्टि को सुव्यवस्थित, समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा। उसे पूरा करने में निरत रहकर ही वह जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। इसी आधार पर मनुष्य देव मानव स्तर को भी प्राप्त कर सकता है। इतने पर भी यदि लोभ, मोह और अहंकार के कुचक्र में फँसकर सुर दुर्लभ सुयोग को व्यर्थ ही गँवा दिया, तो भयंकर भूल होगी। ऐसी गैर जिम्मेदारी इन दिनों तो दिखाई ही नहीं जानी चाहिए।

      बहादुरी-कोई समय था जब किसी को हरा या गिरा देने को बहादुरी कहा जाता था। बलिष्ठ, दुर्बलता पर हावी होकर अपने को योग्य और शूरवीर सिद्ध किया करते थे, पर अब वह रीति मानवी गरिमा में से बहिष्कृत की जा रही है। व्याघ्र, हिरन या खरगोशों को दबोचते रहते हैं। बड़ी मछली छोटी मछली को निगलती रहती हैं। आतताई दुर्बलों का दमन-शोषण करते रहते हैं। बाज जिंदगी भर पक्षियों के अण्डे-बच्चे खाता रहता है, उसे कोई शूरवीर कहाँ कहता है? डाकू, हत्यारे, कसाई नित्य मार-धाड़ मचाए रहते हैं और कितनों का प्राण हरण करते हैं, उन्हें बहादुर होने का श्रेय कहाँ, कब किसने दिया है?

      बहादुरी का प्राचीनतम और अर्वाचीन अर्थ एक ही है ऐसे पराक्रम कर गुजरना, जिससे अपनी महानता उभरती है, और समय, समाज, संस्कृति की छवि निखरती है। ऐसा पुरुषार्थ करने का ठीक यही समय है। सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन और दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन की जैसी आवश्यकता इन दिनों है, उतनी इससे पहले कभी नहीं रही। इस दुहरे मोर्चे पर जो जितना जुझारू हो सके, समझना चाहिए कि उसने युग धर्म समझा और समय की पुकार सुनकर अगली पंक्ति में बढ़ आया।

      दुष्कर्मों में निरत असंख्य लोग देखे जाते हैं। अन्ध विश्वासों और अनाचारों की कहीं कमी नहीं। पानी ढलाव की ओर बढ़ा और ढेला ऊपर से नीचे की ओर गिरता है। निकृष्टता अपनाने में हर किसी के पूर्व संचित कुसंस्कार कुमार्ग की ओर धकेलते हैं। प्रवाह प्रचलन भी ऐसा है जिसमें दुष्प्रवृत्तियाँ ही भरी पड़ी हैं। बुरे कुसंग का, अवांछनीय वातावरण का दुष्प्रभाव भी कम शक्तिशाली नहीं होता। इन सबका समन्वय मिलकर साधारण स्तर के लोगों को पेट प्रजनन तक सीमित रहने और हेय जीवन जीने के लिए ही बाधित करता रहता है। जो इन सब का सामना करते हुए अपने आप को उच्चस्तरीय आदर्शवादिता अपनाने के लिए तत्पर हो सके, समझना चाहिए कि वह सच्चे अर्थों में शूरवीर हैं।

      दुष्टजन गिरोह बना लेते हैं। आपस में सहयोग भी करते हैं। किंतु तथाकथित सज्जन मात्र अपने काम से काम रखते हैं। लोकहित के प्रयोजन के लिए संगठित और कटिबद्ध होने से कतराते हैं। उनकी यही एक कमजोरी अन्य सभी गुणों और सामर्थ्यों को बेकार कर देती है। मन्यु की कमी ही इसका मूल कारण है। यह बहादुरी का ही काम है कि जो बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तन और गाँधी के सत्याग्रह आंदोलनों में सम्मिलित होने वालों की तरह सज्जनों का समुदाय जमा कर लेते हैं। बहादुरी हनुमान, अंगद जैसों की ही सराही जाती है। जो महामानव इसी स्तर के होते हैं। वे अपनी उत्कृष्टता और परमार्थ परायणता के आधार पर ऐसे कृत्य कर दिखाते हैं मानो उन्हें किसी दैवी शक्ति के सहारे उतने बड़े चमत्कार कर दिखाने का अवसर मिला है।

      धर्म-दर्शन अध्यात्म-तत्त्व दर्शन के अनेक नियम निर्धारित हैं। उनके उतार-चढ़ाव और मतभेद ही आमतौर से लोगों के मानस पर छाए रहते हैं, पर अगले दिनों यह नियम पूरी तरह उलट जाएगा। समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के चार चरणों की परिधि में उत्कृष्टता के समस्त सिद्धांतों का समावेश हो जाएगा। इतने छोटे धर्मशास्त्र से भी युग समस्याओं का समाधान हो सकना संभव हो जाएगा।

      अगले दिनों प्रत्येक विचारशील को आत्म निरीक्षण की साधना में किसी न किसी रूप में सम्मिलित होना पड़ेगा। देखना, जाँचना होगा कि उपरोक्त चारों मान्यताओं ने अंत:करण में कितनी गहराई तक प्रवेश किया और उन्हें कार्य रूप में परिणित करने के लिए कितना प्रयास करना पड़ा जो कमी रह रही होगी, उसे पूरा करने के लिए हर भावनाशील अगले दिनों निरंतर प्रयत्न किया करेगा।

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